Thursday, July 1, 2021

वृक्षारोपण

वृक्षारोपण 

 

   वृक्षारोपण मानव समाज का साँस्कृतिक दायित्व है तथा इसे प्रमाणित किया जा सकता है । मानव सभ्यता का उदय और आरंभिक आक्षय प्रकृति यानि वन वृक्ष ही रहे है । उसकी सभ्यता सस्कृति के आरंभिक विकास का पहला चरण भी वन वृक्षो की सघन छाया मे ही उठाया गया । 

वृक्षारोपण  


यहा तक की उसकी समृद्धतम साहित्य कला का सृजन और विकास ही वनालियों की सघन छाया और की गोद मे ही संभव हो सका, यह एक पुरातत्व एव इतिहास सिद्ध बात है । आरंभ मे मनुष्य वनों मे वृक्षो पर या उनसे ढकी कन्दराओ मे ही रहा करता था । वृक्षो से प्राप्त फल फूल आदि खाकर या उसकी डालियों को हथियार की तरह प्रयोग मे ला उनसे शिकार करके अपना पेट भरा करता था ।  


बाद मे बचे खुचे फल और उनकी गुठलियों को दुबारा उगते देखकर ही मानव ने खेती बाड़ी करने की प्रेरणा और सीख प्राप्त की । वृक्षो छाल का ही सदियों तक आदि मानव वरत्र रूप मे प्रयोग करता रहा, बाद मे वन मे रहकर तपस्या करने वालों, वनवासियों के लिए ही वे रह गए थे । इसी प्रकार आरम्भिक वैदिक ऋचाओ की रचना या दर्शन भए सघन वनालियों मे बने आश्रमों मे रहने वाले लोगों ने किए । इतना ही नहीं आरंभ मे ग्रन्थ लिखने के लिए कागज के बाजाय जिस सामग्री का प्रयोग किया गया वे भोजपत्र भी विशेष वृक्षो के पत्ते थे ।

 

सस्कृति की धरोहर माने जाने वाले कई ग्रन्थों की भोजपत्रों पर लिखी गई पाण्डुलिपिया आज भी कही कही उपलब्ध है ।

   वृक्षारोपण का सामान्य एव विशेष सभी का अर्थ है – वृक्ष लगाकर उन्हे उगाना । प्रयोजन है प्रकृति का संतुलन बना रहे । वन संपदा के रूप मे प्रकृति से हमे जो कुछ भी प्राप्त होता या रहा है, वह नियमपुर्वक हमेशा आगे भी प्राप्त होता रहे ताकि हमारे समाज जीवन का संतुलन बना रहे, पर्यावरण की पवित्रता और संतुलन नियमित बने रहे । मानव सृष्टी का सर्व प्राणी है । उसका जीवन सुखी, समृद्ध एव संतुलन रह सके, साँस्कृतिक सामाजिक एव व्यापक मानवीय दृष्टी से इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है ? निश्चय ही अन्य कोंई नहीं । इस कारण भी वृक्षारोपण करना एक प्रकार का सहज साँस्कृतिक दायित्व स्वीकार किया गया है ।

   मानव सभ्यता ने सस्कृति के विकास की दिशा मे कदम बढाते हुए गुफाओ से बाहर निकल और वृक्षो से नीचे उतर कर जब झोपड़ियों का निर्माण आरंभ किया तब तो वृक्षो की शाखाए पत्ते सहायक सामग्री बने ही, बाद मे मकानों भवनों की परिकल्पना साकार करने के लिए भी वृक्षो की लकड़ी से ही किया जा रहा है । कुर्सी, टेबिल, सोफासैट आदि मुख्यत: लकड़ी से ही बनाए जाते है । हमे अनेक प्रकार के फल फूल और औषधियों भी वृक्षो से प्राप्त होती ही है, कई तरह की वनस्पतियों का कारण भी वृक्ष ही है । इतना ही नहीं, वृक्षो के कारण ही हमे वर्षा जल एव पेयजल आदि की भी प्राप्ति हो रही है । 

   वृक्षो की पत्तियों धरती के जल का शोषण कर सूर्य किरणे और प्रकृति बादलों को बनाती है, और वर्षा कराया करती है । कल्पना कीजिए निहित स्वार्थी मानव जिस बेरहमी से वनों वृक्षो को काटता जा रहा है, यदि उस क्षति की पूर्ति के लिए साथ साथ वृक्षारोपण रक्षण न होता रहे, तब धरती के एकदम  वृक्ष शून्य हो जाने की स्थिति मे मानव तो क्या, समूची जीव सृष्टी की क्या दशा होगी ? निश्चय ही वह स्वत: ही जलकर राख का ढेर बन उड़कर अतीत की भूली बिसरी कहानी बनकर रह जाएगा ।


वृक्षारोपण के फायदे:-


   प्राचीन भारत मे निश्चय ही वृक्षारोपण को एक उदान्त साँस्कृतिक दायित्व माना जाता था । तब तो मानव समाज के पास ऊर्जा और ईधन का एकमात्र स्रोत भी वृक्षो से प्राप्त लकड़ी ही हुआ करती थी, जबकि आज कई प्रकार के अन्य स्रोत भी उपलब्ध है । इस कारण उस समय के लोग इस तथ्य को भली भाति समझते थे की यदि हम मात्र वृक्ष काटते रहेगे नहीं उगाएगे, तो एक दिन वनों की वीरानगी के साथ मानव जीवन भी वीरान बनकर रह जाएगा । इसी कारण एक वृक्ष काटने पर दो नए वृक्ष उगाना वे लोग अपना धर्म एव साँस्कृतिक कर्तव्य माना करते थे । 

   जो हो अभी भी बहुत देर नहीं हुई है । अब भी निरंतर वृक्षारोपण और उनके रक्षण के साँस्कृतिक दायित्व का निर्वाह कर सृष्टी को अकाल भावी विनाश से बचाया जा सकता है । व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर इस ओर प्राथमिक स्तर पर ध्यान दिया जाना परं आवश्यक है ।

   जैसा की आप सब जानते है है कुछ सालों से कोरोना का कहर जा रहा है, और वृक्षो के न होने से आक्सीजन को कमी काफी महसूस लगने लगी । उस व्यक्त लोगों को वृक्षो के बारे मे इसकी अहमियत मालूम पड़ी ।


अब हमे सकल्प करना चाहिए, की हमे कम से कम अपने जन्मदिन पर दो वृक्ष जरूर लगाना चाहिए ।

 

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धन्यवाद !!!😃😃

Tuesday, April 27, 2021

बकरे कि बिरयानी

बकरे कि बिरयानी एक बार एक किसान का घोडा बीमार हो गया. उसने उसके इलाज के लिये डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने घोडे का अच्छे से मुआयना किया और बोला....
आपके घोडे को काफी गंभीर बीमारी है. हम तीन दिन तक इसे दवाई देकर देखते है, अगर यह ठीक हो गया तो ठीक नही तो हमे इसे मारना होगा. क्योकि यह बीमारी दूसरे जानवरो मे भी फैल सकती है. यह सब बाते पास मे खडा एक बकरा भी सुन रहा था. अगले दिन डाक्टर आया, उसने घोडे को दवाई दी चला गया. उसके जाने के बाद बकरा घोडे के पास गया. और बोला, उठो दोस्त हिम्मत करो, नही तो यह तुम्हे मार देगे. दूसरे दिन डाक्टर फिर आया और दवाई देकर चला गया. बकरा फिर घोडे के पास आया. और बोला, दोस्त तुम्हे उठना ही होगा. हिम्मत करो नही तो तुम मारे जाओगे. मै तुम्हारी मदद करता हुं, चलो उठो. तीसरे दिन जब डाक्टर आया तो किसान से बोला, मुझे अफसोस है कि हमे इसे मारना पडेगा. क्योकि कोई भी सुधार नजर नही आ रहा. जब वो वहा से गए तो, बकरा घोडे के पास फिर आया और बोला. देखो दोस्त, तुम्हारे लिए अब करो या मरो वाली स्तिथी बन गयी है. अगर तुम आज भी नही उठे तो कल तुम मर जाओगे. इसलिये हिम्मत करो हां बहुत अच्छे थोडा सा और तुम कर सकते हो. शाबाश अब भाग कर देखो तेज और तेज इतने मे किसान वापस आया तो उसने देखा, कि उसका घोडा भाग रहा है. वो खुशी से झुम उठा. और सब घर वालो को इकट्ठा कर चिल्लाने लगा. चमत्कार हो गया. मेरा घोडा ठीक हो गया हमे जश्न मनाना चाहिए आज बकरे कि बिरयानी खायेगे शिक्षा Management या government को कभी नही पता होता कि कौन employee काम कर रहा है, जो काम कर रहा होता है, उसी का ही काम तमाम हो जाता है. ये पूर्यता सत्य है.

Saturday, February 13, 2021

स्वास्थ्य के लिए अनमोल है सरसों का तेल

स्वास्थ्य के लिए अनमोल है सरसों का तेल


सरसों का तेल एक उत्तम खाद्य पदार्थ माना जाता है, इसका प्रयोग भारत के सभी प्रतो मे लगभग किया ही जाता है। आयुर्वेद शास्त्र मे सरसों से साग को लोग चाव से खाते है। पीला सरसों मसाले से लेकर औषधि के उपयोग तक मे यहम भूमिका को निभाने वाला हुआ करता है। सरसों के तेल मे कालेस्टाल का स्तर कम होने के कारण ह्रदय रोगों मे भी लाभदायक बताया जाता है।

स्वास्थ्य के लिए अनमोल है सरसों का तेल


आज के समय मे लोगों मे सरसों तेल के प्रति विमुखता आने लगी है। इसका प्रयोग भोजन मे तो किसी तरह से कर लिया जाता है, किन्तु शारीरिक प्रयोग के लिए इसे छुआ तक नहीं जा रहा है। प्राचीन काल मे सरसों के तेल का प्रयोग करके अधिकतर स्वस्थ रहने की कामना की जाती थी। आज के समय मे सुगंधित तेलों का मकड़जाल इतना अधिक फैल गया है, की सरसों का तेल मानस पटल से विलुप्त ही होने लग गया। आयुर्वेद के गरथों के अनुसार सरसों तेल की उपयोगिता इस प्रकार है।

करते रहने से उसकी खुश्की एव खुरदरापन दूर हो जाता है, तथा हाथों की त्वचा मुलायम हो जाती है।


शीतकाल मे धूप मे बैठ कर सभी उम्र के लोगों को तेल की मालिश करनी चाहिए। शिशुओ को धूप मे लिटाकर सरसों तेल की मालिश करने से उनकी थकान दूर होती है, नीद अच्छी आती है, तथा शरीर के दर्द से राहत मिलती है।

सरसों के तेल मे कपूर मिलाकर कमर, पसलियों, छाती एव सीने पर मालिश करने से सभी स्थानों के दर्द से मुक्ति मिलती है।

बेसन मे सरसों का तेल मिलाकर उबटन की तरह त्वचा पर मलने से त्वचा गोरी हो जाती है, तथा उसमे कमल के समान ताजगी या जाती है।

सरसों के तेल मे शहद मिलाकर दातों एव मसूड़ों पर हल्के हल्के मलते रहने से मसूड़ों से सभी रोग भाग जाते है, तथा दात भी मजबूत होते है।

जुकाम होने पर या नायक के बंद होने पर दो बूद सरसों का तेल नायक के छेदो मे डालकर सास जोर से खीचने पर बंद नायक खुल जाती है, और जुकाम मे भी राहत मिलती है।

सरसों का तेल वातनाशक एव गरम होता है। इसी कारण शीत काल मे वातजन्य दर्द को दूर करने के लिए इस तेल की मालिश करनी चाहिए। जोड़ों का दर्द, मासपेशियों का दर्द, गठिया, छाती का दर्द आदि की पीड़ा भी सरसों के तेल की मालिश से दूर हो जाती है।

सरसों के तेल मे सेधा नमक मिलाकर सुबह शाम दातों पर मलने से दातों से खून आना, मसूड़ों की सूजन, दातो के दर्द मे आराम पहुचता है। साथ ही दात चमकीले व मजबूत भी बनते है।

पैरों के तलवों एव अगूठों मे सरसों का तेल लगाते रहने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। रात को हाथ पावो मे तेल लगाकर सोने से मच्छर नहीं काटते है, तथा नीद भी अच्छी आती है। बालों मे सरसों का तेल लगाते रहने से बाल मजबूत होते है, सफेद नहीं होते तथा सिर दर्द भी नहीं होता।

शीत काल मे पैरों की अगुलियों मे सूजन आ जाती है, ऐसी अवस्था मे सरसों के तेल मे थोड़ा सा पीसा हुआ सेधा नमक मिलाकर गर्म कर ले। ठंडा होने पर अगुलियों पर लेप लगाकर रात मे सो जाए। कुछ दिनों मे आराम दिखाई देगा।

स्नान से पूर्व नित्य नाभि मे दो बूद सरसों का तेल टपकाते रहने से पेट से सबंधित अनेक बीमारियों नहीं होती है, साथ ही पाचन क्रिया अच्छी बनी रहती है।

आग से पक जाने के बाद तुरंत सरसों का तेल लगा लेने से वहा फफोला नहीं होता। लिग एव योनि के भीतरी भाग मे सरसों का तेल लगाकर सभोग करने से अनेक सेक्सुअल बीमारियों से बचा जा सकता है। औषधि प्रयोग के लिए हमेशा शुद्घ तेल का ही प्रयोग हितकर होता है।

लोहे की वस्तुओ पर सरसों का तेल लगा देने से जंग का खतरा नहीं रहता है। नीबू के छिलकों मे सरसों का तेल लगाकर पीतल के बर्तन मलने से उसकी चमक बढ़ जाती है।


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Sunday, October 25, 2020

असली चोर कौन...??? हिंन्दी निबंध

असली चोर कौन...???


शहर से दो मील पर नदी किनारे हरे-भरे वृक्षो वाले एकलव्य आश्रम कि मनमोहिनी छटा सचमुच देखते ही बनती थी. दूर दूर तक एकांत और शांत वातावरण था.


आश्रम मे केवल उन्ही बच्चो को प्रवेश दिया जाता जो हर दृष्टी से योग्य होते थे. गुरु हरिप्रसाद जी आश्रम के सचालक थे, जिनका बच्चे बहुत सम्मान करते थे. वह आश्रम के परिसर मे बने निवास मे ही रहते और वहा कि व्यवस्था का पूरा ध्यान रखते थे. उनकी धर्मपत्नी मधुलता एक विदुषी पविव्रता स्त्री थी. उनका इकलौता पुत्र सौरभ बहुत सुशील और होनहार था...!!!




आश्रम मे कुल पच्चीस छात्र थे. जिनमे उनका पुत्र भी शामिल था. जयंत उन सबका मानिटर था. वह एक निर्धन परिवार से था. उसका पिता सेठ शोभाराम कि दुकान पर मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पाला करता था. सेठजी के लड्के विक्रम ने इसी आश्रम मे प्रवेश ले रखा था. लेकिन उसमे एक कमी थी कि वह जयंत को सदा तिरस्कार कि दृष्टि से देखा करता था.


एक रोज विक्रम ने गुरुजी से कहा कि उसकी जेब से किसी ने चादी का सिक्का चुरा लिया पूछने पर उसने बताया कि उसका शक जयंत पर है.


गुरुजी जयंत पर बहुत स्नेह रखते थे. यही नही, उसे वह अपना सबसे अधिक विश्वासपात्र शिष्य भी समझते थे. उसका नाम सुनकर गुरुजी को बहुत पीडा हुई जो उन्हे अंदर ही अंदर सालने लगी. जब इस बारे मे जयंत समेत सभी बालको से पूछा गया तो उन्होने कहा कि उन्हे कुछ पता नही है.


गुरुजी इसके कारण परेशान रहने लगे. आज तक उनके आश्रम मे ऐसी सुखद घटना पहले कभी नही हुई थी.


आखिर उन्हे एक तरकीब सूझी. शाम को भोजन के बाद उन्होने सभी को बुलाकर कहा देखो बच्चो विक्रम कि जेब से इस तरह सिक्के कि चोरी हो जाना इस आश्रम कि प्रतिष्ठा पर गहरी चोट है. यह तो मानना हे पडेगा कि जिसने यह हरकत कि है, वह कोई बाहर का नही है, बल्की हम मे से ही कोई है. खैर जाने अनजाने मे जिससे भी यह गलती हुई है, उससे मेरा यही कहना है कि वह तुरंत अपनी गलती सुधारे औए सुबह होने से पहले पहले उस सिक्के को आश्रम कि पत्र मंजूषा मे डाल दे. यदि ऐसा नही हुआ तो बहुत कष्ट होगा. इस रिथति मे सिक्के के कीमत मुझे अपनी ओर से अदा करनी होगी...


गुरुजी के इस कथन पर एकदम सन्नाटा छा गया. सोने से पहले बालको मे काफी देर तक इसी बात कि चर्चा होती रही. उनका ह्रदय बार बार कचोट रहा था. कि गुरुजी ने इस घटना से दुखी होकर यदि आश्रम छोड दिया,तो उन सबके लिए वह डूब मरने जैसी बात होगी.

गुरुजी भी देर रात तक सो नही पाए. दूसरी ओर चारपाई पर लेटे सौरभ की नजरे पिता पर लगी हुई थी. वह भी बहुत दुखी था. कुछ देर के बाद जब सौरभ ने देखा कि पिताजी सो रहे है, तो वह चुपके से उठा और बिना किसी आहट के धीरे से बाहर निकल गया.


गुरुजी सचमुच सोए नही थे. बल्कि आखे मीचकर लेटे हुए थे. बेटे का इस तरह बाहर जाना उन्हे कुछ अजीब लगा. पर उस समय वह कुछ बोले नही.


सुबह जब पत्र मंजूषा खोली गई, तो उसमे वह सिक्का मिल गया. गुरुजी समझ गए कि यह घिनौना कार्य उनके ही बेटे सौरभ ने किया है. सुबह दुखी होकर उन्होने सभी छात्रो से कहा कि उन्हे इस बात कि खुशी है कि विक्रम का सिक्का उसे मिल गया, किंतु ऐसी ओछी हरकत करने वाला उनसे छिपा नही रह सका. वह उसे अच्छी तरह जान गए है. फिर भी चूकि उसने अपनी गलती स्वीकार कर ली है. इसलिए आश्रम से निकालने के बजाए, वह केवल उसे तीन दिन लगातार निराहार रहने कि सजा सुनाते है.

सभी बालक एक दूसरे का मुह ताकने लगे. विक्रम पीछे के ओर शांत खडा था. जयंत के चेहरे पर उदासी छाई हुई थी. सौरभ का सिर नीचे ओर झुका था.


गुरुजी कुछ देर रुककर फिर बोले, अब आप सभी यह जानना चाहेगे कि इस दंड का भागी कौन है.???

तो सुनिए !!! दोषी मेरा अपना बेटा सौरभ है.


यह सुनते ही विक्रम जोर से चिल्लाया नही-नही यह पाप सौरभ से नही, मुझसे हुआ है. दौडकर वह गुरुजी के चरणो मे गिर गया, और गिडगिडाते हुए बोला....मुझे माफ कर दो गुरुजी, मुझे माफ कर दो..

सौरभ का इसमे कोई दोष नही है. वह सिक्का किसी ने नही चुराया. इसे मैंने ही सौरभ को रखने के लिए दिया था. मैंने इसे कसम दिलाई थी कि इस बारे मे वह किसी को कुछ नही बताएगा. इसीलिए वह इतने दिन चुप रहा.


तो फिर जयंत पर चोरी का झूठा इल्जाम क्यो लगाया.???

इसके पीछे तेरा क्या मकसद था. गुरुजी ने पूछा...


जयंत से मन ही मन मुझे ईष्र्या होने लगी थी. क्योकि वह मेरी बराबरी कर रहा है. इसलिए मै इसे अपमानित करके किसी तरह आश्रम से निकलवा देना चाहता था. सौरभ ने इस बात के लिए मुझे कोसा भी, लेकिन मै अपने अहंकार मे अकडा रहा. आज मुझे मालूम हुआ कि किसी कि पहचान उसके पैसो से नही, गुणो से होती है.


कहता हुआ वह फूट- फूटकर रोने लगा.


गुरुजी को लगा, विक्रम ने अपनी भूल स्वीकार करके आश्रम को अपवित्र होने से बचा लिया है. उन्होने उसे प्यार से गले लगा लिया.


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Sunday, September 27, 2020

वास्तु शास्त्र दिलाएगा धन समृध्दि

वास्तु शास्त्र दिलाएगा धन समृध्दि


यू तो किसी को किस्मत से ज्यादा नही मिलता लेकिन कई बार अनेक बाधाओ के कारण किस्मत मे लिखी धन समृध्दि भी प्राप्त नही होती.

वास्तु को मानने वाले अगर इसके मुताबिक काम करे तो उन्हे वो मिल सकता है जो अब तक नही मिला है...


                                                       वास्तु शास्त्र दिलाएगा धन समृध्दि


पूर्व दिशा- यहा घर कि संपति और तिजोरी रखना शुभ होता है और उसमे बढोतरी होती रहती है.


पश्चिम दिशा- यहा धन सम्पति और आभूषण रखे जाए तो साधारण ही शुभता का लाभ मिलता है. परंतु घर का मुखिया अपने स्त्री पुरुष मित्रो का सहयोग होने के बाद भी बडी कठिनाई के साथ घन कमा पाता है.


उत्तर दिशा- घर कि इस दिशा मे कैश व आभूषण जिस अलमारी मे रखते है वह अलमारी भवन कि उत्तर दिशा के कमरे मे दक्षिण कि दिवार से लगाकर रखना चाहिए. इस प्रकार रखने से अलमारी उत्तर दिशा कि ओर खुलेगी, उसमे रखे गए पैसे और आभूषण मे हमेशा वृध्दि होती रहेगी.


दक्षिण दिशा- इस दिशा मे धन, सोना,चांदी और आभूषण रखने से नुकसान तो नही होता परंतु बढोतरी भी विशेष नही होती है.


ईशान कोण- यहा पैसा, धन और आभूषण रखे जाए तो यह दर्शाता है कि घर का मुखिया बुध्दिमान है और यदि उत्तर ईशान मे रखे हो, तो घर के एक क्न्या संतान और यदि पूर्व ईशान मे रखे हो तो एक पुत्र संतान बहुत बुध्दिमान और प्रसिध्द होता है.


आग्नेय कोण- यहा धन रखने से धन घटता है, क्योकि घर के मुखिया कि आमदनी घर के खर्चे से कम होने के कारण कर्ज कि स्थिति बनी रहती है.


नैऋत्य कोण- यहा धन, महगा सामान और आभूषण रखे जाए तो वह टिकते जरुर है, किंतु एक बात अवश्य रहती है कि यह धन और सामान गलत ढंग से कमाया हुआ होता है.


वायव्य कोण- यहा धन रखा हो तो खर्च जितनी आमदनी जुटा पाना मुश्किल होता है. ऐसे व्यक्ति का बजट हमेशा गडबडाया रहता है और कर्जदारो से सताया जाता है.


सीढियो के नीचे तिजोरी रखना शुभ नही होता है. सीढियो या टायलेट के सामने भी तिजोरी नही रखना चाहिए. तिजोरी वाले कमरे मे काबाड या मकडी के जाले होने से नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है.

घर कि तिजोरी के पल्ले पर बैठी हुई लक्ष्मी जी कि तस्वीर जिसमे दो हाथी सूंड उठाए नजर आते है, लगाना बडा शुभ होता है. तिजोरी वाले कमरे का रंग क्रीम या आफ व्हाइट रखना चाहिए...



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Wednesday, September 16, 2020

हनुमानजी कि उपासना से मिलेगा रोजगार

 

हनुमानजी कि उपासना से मिलेगा रोजगार/ बेरोजगार 


योग्यता और अनुभव के अनिसार एक अच्छी नौकरी अथवा रोजगार कि अभिलाषा हर मनुष्य की होती है. इसके लिए वह प्रयास भी करता है. परंतु कई बार अथक प्रयासो के बावजूद भी अपेक्षित सफलता नही मिल पाती है.



हनुमानजी कि उपासना से मिलेगा रोजगार





इस स्थिति मे ईश्वर कि शरण मे जाकर प्रार्थना करके रोजगार के लिए प्रयास किये जाते है. किसी मनुष्य कि जन्म कुडली मे नौकरी का योग है, अथवा स्वरोजगार , इस बात की जानकारी कुडली के अध्ययन से की जा सकती है. वही तंत्र मंत्र शास्त्र मे दिए गए, उपायो को करके नौकरी अथवा रोजगार का सपना साकार किया जा सकता है. रोजगार प्राप्त करने के इच्छुक बेरोजगारो को प्रत्येक शनिवार के दिन मारुति नंदन हनुमानजी कि उपासना करके सुन्दरकाण्ड का पाठ अवश्य करना चाहिए. 


हनुमानजी के मंदिर मे शुध्द घी का दिपक जलाकर लाल चंदन अथवा मुंगा कि माला कि सहायता से एक सौ आठ बार कवन सो काज कठिन जग माही, जो नही होय तात तुम पाहीं मंत्र का जाप करना चाहिए.कार्य सिध्द होने पर शनिवार के दिन सवा किलो बूंदी के लड्डू का भोग लगाकर वितरित कर देना चाहिए. घर पर भी प्रतिदिन इस मंत्र का जाप करते रहने से शीघ्र फल कि प्राप्ति होती है. 


किसी नौकरी हेतु साक्षात्कार के लिए पूरी तैयारी करना बहुत आवश्यक है. साथ ही यदि उस दिन लाल चंदन कि माला से 11 बार श्री गणेशजी कि प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष “ ओउम वक्रंतुण्डाय हुं मंत्र का जाप करके शुध्द चित भाव से प्रार्थना कि जाये तो बेरोजगारी कि समस्या से छुटकारा मिल सकता है. श्री गणेशजी कि आराधना करते समय भगवान शिव, माता पार्वती और नंदी देव का ध्यान भी अवश्य करना चाहिए.

 

Wednesday, April 15, 2020

अकबर बीरबल | एक अनोखी कहानी


अकबर बीरबल | एक अनोखी कहानी




एक बार मुगल बादशाह अकबर और उनका अति प्रिय मंत्री बीरबल दोनो शतरंज खेलने बैठे. दोनो के बीच यह शर्त लगी कि उन मे से जो भी व्यक्ति शतरंज की बाजी हारेगा, उसे जीतने वाले कि इच्छा के अनुसार जुर्माना चुकाना होगा.




अकबर बीरबल एक अनोखी कहानी
अकबर बीरबल एक अनोखी कहानी





इसी क्रम मे पहले बीरबल बोला जहापनाह यदि आप जीत गए और मै हार गया तो हुकुम फरमाए कि मै आपको क्या जुर्माना चुकाऊगा ? बादशाह ने जवाब दिया बीरबल यदि यह बाजी मै जीता और तुम हारे तो तुम्हे, जुर्माना स्वरूप मुझे सौ स्वर्ण मुद्राए सौपनी होगी. इस पर बीरबल ने हा मे गर्दन हिलाई. अब बारी बीरबल कि थी, वह बोला जहापनाह, यदि इस बाजी मे आप हारे और मै जीता तो आप मुझे जुर्माना के रुप मे शतरंज के 64 खानो मे गेहू के दाने रखकर चुकाएगे.


लेकिन इसमे मेरी एक छोटी सी शर्त यह रहेगी, कि आपको शतरंज के पहले खाने मे गेहू का एक दाना रखना होगा, दूसरे खाने मे पहले के दुगने दो दाने, तीसरे खाने मे दो के दुगने चार दाने, चौथे खाने मे चार के दुगने आठ दाने, पाचवे खाने मे आठ के दुगने सोलह दाने....


ऐसे करते हुए शतरंज के सभी चौसठ खानो मे गेहू के दाने रख कर वे सारे गेहू के दाने जुर्माना स्वरुप मुझे सौप दे. बस यही मेरी शर्त है. बीरबल कि इस छोटी सी माग को सुनकर बादशाह अकबर ने जोरदार ठहाका लगाया, और बोला बीरबल मुझे तुम्हारी यह शर्त मंजूर है.


इसके बाद शतरंज का खेल शुरु हुआ. अब संयोग देखिए कि शतरंज कि उस बाजी मे बीरबल जीत गया और बादशाह अकबर को हार का मुह देखना पडा. अब बारी आई हारने वाले को जीतने वाले का जुर्माना चुकाने की. हारने वाले अकबर बादशाह ने बडे ही अहंकार के साथ अपने खजांची को हुकुम दिया, कि वह बीरबल को शर्त के अनुसार शतरंज के 64 खानो मे गेहू के दाने रख कर कुल दाने चुका दे.


बीरबल कि इस शर्त को पूरी करने के दौरन अकबर बादशाह का खजांची थोडी ही देर मे पसीने-पसीने हो गया. फिर वह अकबर बादशाह के सामने हाथ जोडकर खडा हो गया और बोला जहापनाह हम हुकूमत का सारा खजाना खाली कर ले, तो भी बीरबल कि इस शर्त को पूरी नही कर पाएगे. 

अकबर याने सुल्तान-ए-हिन्द को खजांची कि बात पर विश्वास नही हुआ. लेकिन जब खुद उसने 64 खानो कि जोड लगाई तो उसका मुह खुला का खुला रह गया.


आप भी शायद मेरी बात से इत्तेफाक नही रख रहे है. चलिए मै आपको समझाता हू. बीरबल की शर्त के अनुसार जहा शतरंज के पहले खाने मे गेहू का केवल एक दाना, दूसरे खाने मे दो दाने, तीसरे खाने मे चार दाने ऐसे रखे गये थे. वही शतरंज के सबसे आखिरी अकेले चौसठवे खाने मे गेहू के 9223372036854775808 दाने रखने पड रहे थे और एक से लगा कर चौसठ तक के सभी खानो मे रखे जाने वाले गेहू के कुल दानो कि संख्या हो रही है. 18446744073709551615 जिनका कुल वजन होता है. 1,19,90,00,00,000 मैट्रिक टन जो कि वर्ष 2019 के सम्पूर्ण विश्व के गेहू के उत्पादन से 1645 गुणा अधिक है.


साथियो, वृध्दि दो तरह की होती है. पहली संख्यात्मक वृध्दि और दूसरी होती है गुणात्मक वृध्दि. यदि शतरंज के चौसठ खानो मे क्रमश: 1, 2, 3.........62, 63, 64 कर के प्रत्येक खाने मे उसकी संख्या के अनुसार गेहू के दाने रखे जाते तो 64 खानो मे रखे गेहू के कुल दानो का योग होता मात्र 2080 दाने और यह कहलाती है संख्यात्मक वृध्दि जबकि बीरबल के द्वारा बताई गई गणना कहलाती है गुणात्मक वृध्दि. जहा संख्यात्मक वृध्दि मे 64 खानो का योग मात्र 2080 दाने होते है, वही गुणात्मक वृध्दि मे तो मात्र 11 खानो का योग ही 2047 दाने हो जाता है.





मै आशा करता हू, कि आप को मेरा यह पोस्ट पसंद आया होगा.