होली
होली की परम्परा:
होली सिर्फ रंगों का त्योहार नही है, यह भारत की संस्कृति और रीति-रिवाजों से भी
जुडा है. ग्रामीण अंचलों मे, खासकर उत्तर भारत के इलाको मे होली पर कच्चे
अधपके अनाज को आग मे भूनकर खाने का रिवाज है. उस अनाज को ‘होला’ कहते है. होली की शुरुआत का ज्रिक करते हुए
आचार्य सत्यकेतु विध्यालंकार ने लिखा है, कि यह नवधान्य सस्येष्टी का त्योहार था.
खेत के अधपके अन्न को यज्ञ मे दान करके प्रसाद के
रुप में खाया जाता थ. इस अन्न को ‘होला’ कहते है, इसी से इसका नाम ‘होलिकोत्सव’ पडा . अब यह राग और रंग का त्योहार हो गया है.
भारत और भारत से बाहर भी जहां भारत के लोग समूह बनाकर थोडी-सी संख्या मे भी रहते है, वहां धूमधाम और मस्ती से सराबोर इस त्योहार को
मनाते है. कम से कम होली मे तो वे अपने साथ दूसरों को भी जोड लेते हैं. होलिका दहन
के दूसरे दिन होली खेली जाती है. इस दिन को धुलेंडी, धुरड्डी या धूलिवंदन भी कहते है. लोग एक-दूसरे
पर रंग, अबीर और गुलाल आदि फेंकते, ढोल बजाकर, होली के गीत गाकर और घर-घर जाकर रंग लगाते है.
राग-रंग का त्योहार नई फसल की खुशी के साथ वसंत के राग-रंग मे भी रंगा होता है. कुदरत
भी इस समय जैसे अपनी उमंग के साथ चरम अवस्था पर होती है. फाल्गुन क्योंकि वर्ष का सुहाना
और संवत्सर का आखिरी महीना है.
लिहाजा होली का एक नाम ‘फाल्गुनी’ भी प्रचलित है. त्योहार वसंत पंचमी से ही शुरु
हो जाता है. उस दिन लोग पहली बार गुलाल उडाते है. फाग और धमार गाना शुरु हो जाता है, खेतो मे फसले खिलने लगती है. पेड-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से भर उठते है.
लोग पारंपरिक गीत-संगीत की धुन के साथ नृत्य-संगीत मे डूब जाते है. यह कोई नई शुरुआत
नही है. फाल्गुन पूणिमाको होली, श्रावण पूणिमा को श्रावणी, आश्विन शुक्ल की दशमी पर शक्ति पूजा और विजयादशमी
के अलावा कार्तिक अमावस्या को दीपावली के चार बडे और प्रमुख त्योहार इतिहास और संस्कृति
के शुरुआती दिनो से मनाए जाते है. इन चारो त्योहारो को अतिप्राचीन और प्राणवान कहा
जाता है. प्राणवान अर्थात जिसमे ऊर्जा और संदेश निहित है. चारो पर्वो के संदेश व्यक्त
करते हुए स्वामी दयानंद सरस्वती ने श्रावणी की प्रेरणा विद्या, विजयादशमी की शक्ति, दिपावली की समृध्दी और होली की प्रेरणा उल्लास
और समरसता बताया है. राग-रंग इस पर्ब से कुछ इस तरह जुडे है, कि इस पर्ब को आदिपर्ब कहा जाता है. उन विद्दानो
ने भी इसे सबसे पहला त्योहार माना है, जो आर्यो को बाहर से आया मानते है. इतिहासकार विल
ड्यूरेंट का मानना है, कि भारत मे आर्यो के आगमन के समय इस पर्ब का प्रचलन था, लेकिन यह प्राय: पूर्वी भारत मे ही मनाया जाता
था.
होली की अनेक अंतर्कथाएं है. सबसे प्रसिध्द और पुरानी
प्रह्लाद की कहानी है. कहते है, कि अतिप्राचीन काल मे हिरण्यकाशिपु नाम का असुर
था. वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था. अपने अलावा किसी और को ईश्वर कहने पर उसने
पाबंदी लगा दी थी. उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था. जब उन्हे यह बात पता चली कि
उनका बेटा प्रहलाद किसी विष्णु नाम के देवता की पूजा करता है, तो उन्हे यह बात बिलकुल पसंद नही आई. उन्होने प्रह्लाद
को बहुत बार समझाया कि वह विष्णु की पूजा करना छोड दे लेकिन प्रह्लाद नही माना.
हिरण्यकशिपु
ने उसे कठोर दंड दिए, परंतु प्रह्लाद ने मार्ग न छोडा. हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को
मारने कि लिए अपनी बहन होलिका की मदद ली. होलिका को भगवान शंकर से वरदान प्राप्त था.
उसे वरदान में एक ऐसी चादर मिली थी, जिसे ओढने पर अग्नि उसे जला नही सकती थी. होलिका
उस चादर को ओढकर प्रह्लाद को अपनी गोद मे लेकर बैठ गई, लेकिन वह चादर उडकर प्रह्लाद के ऊपर आ गई और प्रहलाद
की जगह होलिका ही जल गई. ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद मे इस दिन होली जलाई जाती है.
होली कैसे मनाये:
साहित्यकारों और संतजनो ने प्रह्लाद का अर्थ आनंद मना है. उत्पीडन और अनाचार की प्रतीक
होलिका जलती है, और प्रेम का प्रतीक प्रह्लाद आनंद रहता है.
यह भी माना जाता है, कि श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का
वध किया था. इसी खुशी मे गोपियो और ग्वालो ने रासलीला की और रंग खेला था.
पर्ब के पहले दिन होलिका दहन होता है. चौराहो पर
और जहां भी कही लकडी एकत्र की गई होती है, होली जलाई जाती है. होलिका जलाने के लिए खासतौर
से लकडियो और उपलो का प्रयोग किया जाता है. भरभोलिए या बलूडिए जलाने का भी रिवाज है.
यह गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते है, जिनके बीच मे छेद होता है. इस छेद मे मूज की रस्सी
डालकर माला बनाई जाती है होली मे आग लगाने से पहले इस माला को बहनें, भाइयो के सिर पर वारकर होलिका की लकडियो मे फेक
देती है. भावना की जाती है, कि भाइयो पर लगी बुरी नजर भी जल जाए.

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